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जूही की कली – सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

विजन-वन-वल्लरी पर सोती थी सुहाग-भरी--स्नेह-स्वप्न-मग्न-- अमल-कोमल-तनु तरुणी--जुही की कली, दृग बन्द किये, शिथिल--पत्रांक में, वासन्ती निशा थी; विरह-विधुर-प्रिया-संग छोड़ किसी दूर देश में था पवन जिसे कहते हैं मलयानिल। आयी याद बिछुड़न से मिलन की वह मधुर बात, आयी याद चाँदनी की धुली हुई आधी रात, आयी याद कान्ता की कमनीय गात, फिर क्या? पवन उपवन-सर-सरित गहन -गिरि-कानन कुञ्ज-लता-पुञ्जों को पार कर पहुँचा जहाँ उसने की केलि कली खिली साथ। सोती थी, जाने कहो कैसे प्रिय-आगमन वह? नायक ने चूमे कपोल, डोल उठी वल्लरी की लड़ी जैसे हिंडोल। इस पर भी जागी नहीं, चूक-क्षमा माँगी नहीं, निद्रालस बंकिम विशाल नेत्र मूँदे रही-- किंवा मतवाली थी यौवन की मदिरा पिये, कौन कहे? निर्दय उस नायक ने निपट निठुराई की कि झोंकों की झड़ियों से सुन्दर सुकुमार देह सारी झकझोर डाली, मसल दिये गोरे कपोल गोल; चौंक पड़ी युवती-- चकित चितवन निज चारों ओर फेर, हेर प्यारे को सेज-पास, नम्र मुख हँसी-खिली, खेल रंग, प्यारे संग

राम की शक्तिपूजा -निराला

रवि हुआ अस्त; ज्योति के पत्र पर लिखा अमररह गया राम-रावण का अपराजेय समरआज का तीक्ष्ण शर-विधृत-क्षिप्रकर, वेग-प्रखर,शतशेलसम्वरणशील, नील नभगर्ज्जित-स्वर,प्रतिपल - परिवर्तित - व्यूह - भेद कौशल समूहराक्षस - विरुद्ध प्रत्यूह,-क्रुद्ध - कपि विषम हूह,विच्छुरित वह्नि - राजीवनयन - हतलक्ष्य - बाण,लोहितलोचन - रावण मदमोचन - महीयान,राघव-लाघव - रावण - वारण - गत - युग्म - प्रहर,उद्धत - लंकापति मर्दित - कपि - दल-बल - विस्तर,अनिमेष - राम-विश्वजिद्दिव्य - शर - भंग - भाव,विद्धांग-बद्ध - कोदण्ड - मुष्टि - खर - रुधिर - स्राव,रावण - प्रहार - दुर्वार - विकल वानर - दल - बल,मुर्छित - सुग्रीवांगद - भीषण - गवाक्ष - गय - नल,वारित - सौमित्र - भल्लपति - अगणित - मल्ल - रोध,गर्ज्जित - प्रलयाब्धि - क्षुब्ध हनुमत् - केवल प्रबोध,उद्गीरित - वह्नि - भीम - पर्वत - कपि चतुःप्रहर,जानकी - भीरू - उर - आशा भर - रावण सम्वर।लौटे युग - दल - राक्षस - पदतल पृथ्वी

सरोज स्मृति —– सूर्यकांत त्रिपाठी ‘निराला’

ऊनविंश पर जो प्रथम चरणतेरा वह जीवन-सिन्धु-तरण;तनये, ली कर दृक्पात तरुणजनक से जन्म की विदा अरुण!गीते मेरी, तज रूप-नामवर लिया अमर शाश्वत विरामपूरे कर शुचितर सपर्यायजीवन के अष्टादशाध्याय,चढ़ मृत्यु-तरणि पर तूर्ण-चरणकह - "पित:, पूर्ण आलोक-वरणकरती हूँ मैं, यह नहीं मरण,'सरोज' का ज्योति:शरण - तरण!"  अशब्द अधरों का सुना भाष,मैं कवि हूँ, पाया है प्रकाशमैंने कुछ, अहरह रह निर्भरज्योतिस्तरणा के चरणों पर।जीवित-कविते, शत-शर-जर्जरछोड़ कर पिता को पृथ्वी परतू गई स्वर्ग, क्या यह विचार --"जब पिता करेंगे मार्ग पारयह, अक्षम अति, तब मैं सक्षम,तारूँगी कर गह दुस्तर तम?" --कहता तेरा प्रयाण सविनय, --कोई न था अन्य भावोदय।श्रावण-नभ का स्तब्धान्धकारशुक्ला प्रथमा, कर गई पार!धन्ये, मैं पिता निरर्थक था,कुछ भी तेरे हित न कर सका!जाना तो अर्थागमोपाय,पर रहा सदा संकुचित-कायलखकर अनर्थ आर्थिक पथ परहारता रहा मैं स्वार्थ-समर।शुचिते, पहनाकर चीनांशुकरख सका न तुझे अत: दधिमुख।क्षीण का न छीना कभी अन्न,मैं लख न सका वे दृग विपन्न;अपने आँसुओं अत: बिम्बितदेखे हैं अपने ही मुख-चित।सोचा है नत हो बार बार --"यह हिन्दी का स्नेहोपहार,यह नहीं हार मेरी, भास्वरयह रत्नहार-लोकोत्तर वर!" --अन्यथा, जहाँ है

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