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पद्मावत रत्नसेन जन्म खंड

चित्रसेन चितउर गढ राजा । कै गढ कोट चित्र सम साजा ॥ तेहि कुल रतनसेन उजियारा । धनि जननी जनमा अस बारा ॥ पंडित गुनि सामुद्रिक देखा । देखि रूप औ लखन बिसेखा ॥ रतनसेन यह कुल-निरमरा । रतन-जोति मन माथे परा ॥ पदुम पदारथ लिखी सो जोरी । चाँद सुरुज जस होइ अँजोरी ॥ जस मालति कहँ भौंर वियोघी । तस ओहि लागि होइ यह जोगी । सिंघलदीप जाइ यह पावै । सिद्ध होइ चितउर लेइ आवै ॥ मोग भोज जस माना, विक्रम साका कीन्ह । परखि सो रतन पारखी सबै लखन लिखि दीन्ह ॥1॥   अर्थ:  चितौड़ का राजा चित्रसेन था, उसने अपने किले को विचित्र परकोटों से सुसज्जित किया था. रत्नसेन ने उसके यहाँ जन्म लेकर उसके कुल को प्रकाशित कर दिया. ऐसे बालक को जन्म देने वाली माता भी धन्य है. पंडितों, विद्वानों और ज्योतिषियों ने उसके रूप और लक्षणों को देख कर उसके भविष्य के बारे में बताया. उनके अनुसार, यह बालक निर्मल रत्न के

पद्मावत-सुआ खंड- भाग-2

बँधिगा सुआ करत सुख केली । चूरि पाँख मेलेसि धरि डेली ॥ तहवाँ बहुत पंखि खरभरहीं । आपु आपु महँ रोदन करही ॥ बिखदाना कित होत अँगूरा । जेहि भा मरन डह्न धरि चूरा ॥ जौं न होत चारा कै आसा । कित चिरिहार ढुकत लेइ लासा ?॥ यह बिष चअरै सब बुधि ठगी । औ भा काल हाथ लेइ लगी ॥ एहि झूठी माया मन भूला । ज्यों पंखी तैसे तन फूला ॥ यह मन कठिन मरै नहिं मारा । काल न देख, देख पै चारा ॥ हम तौ बुद्धि गँवावा विष-चारा अस खाइ । तै सुअटा पंडित होइ कैसे बाझा आइ ?॥5॥   अर्थ: सुखों में खेलता सुआ कैद हो गया. तब बहेलिये ने उसके पंख मरोड़ कर उसे पिटारे में डाल दिया. वहाँ और भी बहुत सारे पक्षी थे, जिनमें खलबली मची थी. सभी अपना-अपना रोना रो रहे थे. ईश्वर ने विष से भरा फल क्यों उत्पन्न किया, जिसे खाकर यूं मरना पड़ा और पंख तुड़वाने पड़े. अगर हम

पद्मावत-सुआ खंड- भाग-1

पदमावति तहँ खेल दुलारी । सुआ मँदिर महँ देखि मजारी ॥ कहेसि चलौं जौ लहि तन पाँखा । जिउ लै उडा ताकि बन ढाँखा ॥ जाइ परा बन खँड जिउ लीन्हें । मिले पँखि, बहु आदर कीन्हें ॥ आनि धरेन्हि आगे फरि साखा । भुगुति भेंट जौ लहि बिधि राखा ॥ पाइ भुगुति सुख तेहि मन भएऊ । दुख जो अहा बिसरि सब गएऊ ॥ ए गुसाइँ तूँ ऐस विधाता । जावत जीव सबन्ह भुकदाता ॥ पाहन महँ नहिं पतँग बिसारा । जहँ तोहि सुनिर दीन्ह तुइँ चारा ॥ तौ लहि सोग बिछोह कर भोजन परा न पेट । पुनि बिसरन भा सुमिरना जनु सपने भै भेंट ॥1॥   अर्थ : उधर पद्मावती मानसरोवर तट पर सखियों के साथ खेल रही थी, इधर महल में तोता अपनी मृत्यु (मजारी- मार्जारी-बिल्ली; सांकेतिक अर्थ :मृत्यु) को सामने देख कर चिंतित था. उसने सोचा, ‘जब तक पंखों में शक्ति है, यहाँ से भागकर प्राण बचाने का प्रयत्न करना चाहिए.’ यह सोचकर वह ढाक

पद्मावत-मानसरोदक खंड- भाग-2 (हार का खोना)

धरी तीर सब कंचुकि सारी । सरवर महँ पैठीं सब बारी ॥ पाइ नीर जानौं सब बेली । हुलसहिं करहिं काम कै केली ॥ करिल केस बिसहर बिस-हरे । लहरैं लेहिं कवँल मुख धरे ॥ नवल बसंत सँवारी करी । होइ प्रगट जानहु रस-भरी ॥ उठी कोंप जस दारिवँ दाखा । भई उनंत पेम कै साखा ॥ सरवर नहिं समाइ संसारा । चाँद नहाइ पैट लेइ तारा ॥ धनि सो नीर ससि तरई ऊईं । अब कित दीठ कमल औ कूईं ॥ चकई बिछुरि पुकारै , कहाँ मिलौं, हो नाहँ । एक चाँद निसि सरग महँ, दिन दूसर जल माँह ॥5॥ अर्थ: पद्मावती और उसकी सखियों ने अपनी साड़ियाँ और अंगियाँ किनारे पर रखी और सरोवर में उतर गयीं. जैसे बेलें जल मिलने से खिल उठती हैं, वैसे ही सारी प्रसन्न होकर सरोवर में काम क्रीड़ा करने लगीं. उनके बिखरे हुए काले बाल सरोवर की लहरों के साथ लहरा रहे हैं. मुख रुपी कमलों को पकड़े होने के कारण

पद्मावत-मानसरोदक खंड- भाग-1

एक दिवस पून्यो तिथि आई । मानसरोदक चली नहाई ॥ पदमावति सब सखी बुलाई । जनु फुलवारि सबै चलि आई ॥ कोइ चंपा कोइ कुंद सहेली । कोइ सु केत, करना, रस बेली ॥ कोइ सु गुलाल सुदरसन राती । कोइ सो बकावरि-बकुचन भाँती ॥ कोइ सो मौलसिरि, पुहपावती । कोइ जाही जूही सेवती ॥ कोई सोनजरद कोइ केसर । कोइ सिंगार-हार नागेसर ॥ कोइ कूजा सदबर्ग चमेली । कोई कदम सुरस रस-बेली ॥ चलीं सबै मालति सँग फूलीं कवँल कुमोद । बेधि रहे गन गँधरब बास-परमदामोद ॥1॥   अर्थ: एक दिन पूर्णिमा की तिथि को पद्मावती मानसरोदक (मानसरोवर) में स्नान के लिए गई. उसने अपनी सभी सखियों को भी आमंत्रित किया और वे सारी विभिन्न फूलों की वाटिका के समान चली आईं. कोई सखी चंपा के फूल के समान है तो कोई कुंद की तरह. कोई केतकी, कोई करना तो कोई रसबेलि के समान है. कोई लाल गुलाल के समान सुंदर दिखने वाली है तो कोई गुलबकावली के गुच्छे

पद्मावत-जन्म खंड- भाग-2-पद्मावती और हीरामन

पद्मावती और हीरामन

भै उनंत पदमावति बारी । रचि रचि विधि सब कला सँवारी ॥ जग बेधा तेहि अंग-सुबासा । भँवर आइ लुबुधे चहुँ पासा ॥ बेनी नाग मलयागिरि पैठी । ससि माथे होइ दूइज बैठी ॥ भौंह धनुक साधे सर फेरै । नयन कुरंग भूलि जनु हेरै ॥ नासिक कीर, कँवल मुख सोहा । पदमिनि रूप देखि जग मोहा ॥ मानिक अधर, दसन जनु हीरा । हिय हुलसे कुच कनक-गँभीरा ॥ केहरि लंक, गवन गज हारे । सुरनर देखि माथ भुइँ धारे ॥ जग कोइ दीठि न आवै आछहि नैन अकास । जोगि जती संन्यासी तप साधहि तेहि आस ॥6॥ अर्थ: बालिका पद्मावती धीरे-धीरे यौवन के बोझ से झुकने लगी. विधि ने उसे सभी कलाओं में श्रेष्ठ बनाया. संपूर्ण जगत उसके यौवन की सुगंध से सुरभित हो उठा और उसके सौन्दर्य से आकर्षित होकर भँवरे आसपास मंडराने लगे. उसकी वेणी (जूड़ा) नागिन के समान है, जो मलय पर्वत रुपी उसकी पीठ पर लहरा रही है. उसके माथे की चमक ऐसी है,

पद्मावत-जन्म खंड- भाग-1-पद्मावती के जन्म की कहानी

चंपावति जो रूप सँवारी । पदमावति चाहै औतारी ॥ भै चाहै असि कथा सलोनी । मेटि न जाइ लिखी जस होनी ॥ सिंघलदीप भए तब नाऊँ । जो अस दिया बरा तेहि ठाऊँ ॥ प्रथम सो जोति गगन निरमई । पुनि सो पिता माथे मनि भई ॥ पुनि वह जोति मातु-घट आई । तेहि ओदर आदर बहु पाई ॥ जस अवधान पूर होइ मासू । दिन दिन हिये होइ परगासू ॥ जस अंचल महँ छिपै न दीया । तस उँजियार दिखावै हीया ॥ सोने मँदिर सँवारहिं औ चंदन सब लीप । दिया जो मनि सिवलोक महँ उपना सिंघलदीप ॥1॥ अर्थ : चंपावती के सुंदर रूप वाले शरीर में पद्मावती ने अवतार लेना चाहा. इस प्रकार इस सुंदर कथा का जन्म हुआ. यह विधि का विधान है, अर्थात जैसा होना लिखा है, उसे मिटाया नहीं जा सकता. पद्मावती जैसे दीपक से प्रकाशित होने के कारण सिंहल द्वीप का नाम संपूर्ण जगत में प्रसिद्ध हुआ. वह ज्योति पहले आकाश में निर्मित

पद्मावत की कथा

पद्मावती की कहानी

कवि सिंहलद्वीप, उसके राजा गन्धर्वसेन, राजसभा, नगर, बगीचे इत्यादि का वर्णन करके पद्मावती के जन्म का उल्लेख करता है। राजभवन में हीरामन नाम का एक अद्भुत सुआ था जिसे पद्मावती बहुत चाहती थी और सदा उसी के पास रहकर अनेक प्रकार की बातें कहा करती थी। पद्मावती क्रमश: सयानी हुई और उसके रूप की ज्योति भूमण्डल में सबसे ऊपर हुई। जब उसका कहीं विवाह न हुआ तब वह रात दिन हीरामन से इसी बात की चर्चा किया करती थी। सूए ने एक दिन कहा कि यदि कहो तो देश देशान्तर में फिरकर मैं तुम्हारे योग्य वर ढूँढूँ। राजा को जब इस बातचीत का पता लगा तब उसने क्रुद्ध होकर सूए को मार डालने की आज्ञा दी। पद्मावती ने विनती कर किसी प्रकार सूए के प्राण बचाए। सूए ने पद्मावती से विदा माँगी, पर पद्मावती ने प्रेम के मारे सूए को रोक लिया। सूआ उस समय तो रुक गया, पर उसके

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड-छठा पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

पुनि चलि देखा राज-दुआरा । मानुष फिरहिं पाइ नहिं बारा ॥ हस्ति सिंघली बाँधे बारा । जनु सजीव सब ठाढ पहारा ॥ कौनौ सेत, पीत रतनारे । कौनौं हरे, धूम औ कारे ॥ बरनहिं बरन गगन जस मेघा । औ तिन्ह गगन पीठी जनु ठेघा ॥ सिंघल के बरनौं सिंघली । एक एक चाहि एक एक बली ॥ गिरि पहार वै पैगहि पेलहिं । बिरिछ उचारि डारि मुख मेलहिं ॥ माते तेइ सब गरजहिं बाँधे । निसि दिन रहहिं महाउत काँधे ॥ धरती भार न अगवै, पाँव धरत उठ हालि । कुरुम टुटै, भुइँ फाटै तिन हस्तिन के चालि ॥21॥ अर्थ: इसके बाद चलकर राजद्वार को देखें. मनुष्य कहीं भी घूम ले, ऐसा द्वार नहीं पा सकता. राजद्वार पर सिंहली हाथी बंधे हुए हैं, जो साक्षात् पहाड़ की तरह लगते हैं. इन हाथियों में कोई सफ़ेद है, कोई पीला तो कोई लाल. कोई हरा है, कोई धुएँ के रंग का तो कोई काला. उनका रंग आकाश के बादलों जैसा

पद्मावत-सिंहलद्वीप वर्णन खंड पंचम पृष्ठ-मलिक मुहम्मद जायसी

निति गढ बाँचि चलै ससि सूरू । नाहिं त होइ बाजि रथ चूरू ॥ पौरी नवौ बज्र कै साजी । सहस सहस तहँ बैठे पाजी ॥ फिरहिं पाँच कोतवार सुभौंरी । काँपै पावैं चपत वह पौरी ॥ पौरहि पौरि सिंह गढि काढे । डरपहिं लोग देखि तहँ ठाढे ॥ बहुबिधान वै नाहर गढे । जनु गाजहिं, चाहहिं सिर चढे ॥ टारहिं पूँछ, पसारहिं जीहा । कुंजर डरहिं कि गुंजरि लीहा ॥ कनक सिला गढि सीढी लाई । जगमगाहि गढ ऊपर ताइ ॥ नवौं खंड नव पौरी , औ तहँ बज्र-केवार । चारि बसेरे सौं चढै, सत सौं उतरे पार ॥17॥  अर्थ: किला  इतना ऊँचा है कि सूर्य और चन्द्रमा रोज इससे बचके निकलते हैं, अन्यथा उनके रथ इससे टकराकर चूर हो जायेंगे. इसके नौ द्वार वज्र के समान कठोर हैं. इन दरवाजों पर हजारों सैनिक रक्षा के लिए तैनात हैं. पांच कोतवाल इन द्वारों के चक्कर लगाते हैं. इसी कारण इन द्वारों को पार करते समय भय से पैर

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