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आज हृदय भर-भर आता है – शमशेर

आज हृदय भर-भर आता है, सारा जीवन रुक-सा जाता; वह आँखों में छाए जाते कुछ भी देख नहीं मैं पाता ! कौन पाप हैं पूर्व-जन्म के, जिनका मुझको फल मिलता है? मैंने नगर जलाए होंगे, जो मेरा सब तन जलता है ! पथ नदियों के मोड़े होंगे, देश-देश तरसाया होगा, विकल सहस्त्र मीन सा तब तो यह पापी मन पाया होगा ! अनगिनती हृदयों की बस्ती, मैंने, आह! उजाड़ी होंगी, तब तो इतनी सूनी मेरे- प्राणों की फुलवाड़ी होगी! अपने लघु जीवन में कैसा छवि का निर्दय स्वप्न बसाया, जो सब कुछ हो स्वप्न गया है, मुझे बनाकर अपनी छाया ! घेर-घेर लेती है मुझको कैसी पतझर की सी आहें? बरसे आंसू का धुँधलापन रोक रहा है उर की राहें ! कितने करुणा के बादल हैं मेरे काल-क्षितिज के बाहर, जिनकी शीतल गति की छाया कभी-कभी पड़ती है मुझपर ! उठता सुख से सिहर मरुस्थल मेरे उर का- दो कण पाकर उस सुषमा की छाँह-निमिष का; जिस में अस्फुट-सा आशा-स्वर ! इस प्रकार कितनी आशाएँ . छोड़ गयीं निज शांत प्रतिस्वर, कितने प्रश्न हो गए उत्तर मौनह्रदय में ही उठ- उठ कर ! आज न जाने

सूर्योदय – शमशेर बहादुर सिंह

प्रात नभ था बहुत नीला शंख जैसे भोर का नभ राख से लीपा हुआ चौका (अभी गीला पड़ा है) बहुत काली सिल जरा-से लाल केशर से कि धुल गयी हो स्लेट पर या लाल खड़िया चाक मल दी हो किसी ने नील जल में या किसी की गौर झिलमिल देह जैसे हिल रही हो। और... जादू टूटता है इस उषा का अब सूर्योदय हो रहा है।

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