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आशीर्वाद

आशीर्वाद

(1) लाजवंती के यहाँ कई पुत्र पैदा हुए; मगर सब-के-सब बचपन ही में मर गए. आखिरी पुत्र हेमराज उसके जीवन का सहारा था. उसका मुंह देखकर वह पहले बच्चों की मौत का ग़म भूल जाती थी. यद्यपि हेमराज का रंग-रूप साधारण दिहाती बालकों का-सा ही था, मगर लाजवंती उसे सबसे सुंदर समझती थी. मातृ-वात्सल्य ने आँखों को धोखे में डाल दिया था. लाजवंती को उसकी इतनी चिंता थी कि दिन-रात उसे छाती से लगाए फिरती थी; मानो वह कोई दीपक हो, जिसे बुझाने के लिए हवा के तेज़ झोंके बार-बार आक्रमण कर रहे हों. वह उसे छिपा-छिपाकर रखती थी, कहीं उसे किसी की नज़र न लग जाय. गाँव के लड़के खेतों में खेलते फिरते हैं, मगर लाजवंती हेमराज को घर से बाहर न निकलने देती थी. और कभी निकल भी जाता, तो घबराकर ढूँढने लग जाती थी. गाँव की स्त्रियाँ कहतीं- “हमारे भी तो लड़के हैं, तू ज़रा सी बात में

अलबम -सुदर्शन

पंडित शादीराम ने ठंडी साँस भरी और सोचने लगे-क्या यह ऋण कभी सिर से न उतरेगा? वे निर्धन थे,परंतु दिल के बुरे न थे।वे चाहते थे कि चाहे जिस भी प्रकार हो,अपने यजमान लाला सदानंद का रुपया अदा कर दें।उनके लिए एक-एक पैसा मोहर के बराबर था।अपना पेट काटकर बचाते थे,परंतु जब चार पैसे इकट्ठे हो जाते,तो कोई ऐसा खर्च निकल आता कि सारा रुपया उड़ जाता।शादीराम के हृदय पर बर्छियाँ चल जाती थीं।उनका हाल वही होता था,जो उस डूबते हुए मनुष्य का होता है,जो हाथ-पाँव मारकर किनारे तक पहुँचे और किनारा टूट जाए।उस समय उसकी दशा कैसी करुणा-जनक,कैसी हृदय-बेधक होती है।वह प्रारब्ध को गालियाँ देने लगता है।यही दशा शादीराम की थी।      इसी प्रकार कई वर्ष बीत गए,शादीराम ने पैसा बचा-बचाकर अस्सी रूपये जोड़ लिए।उन्हें लाला सदानंद को पांच सौ रूपये देने थे।इन अस्सी रूपये की रकम से ऋण उतारने का समय निकट प्रतीत हुआ।आशा धोखा दे रही थी।एकाएक उनका छोटा

साइकिल की सवारी – सुदर्शन

भगवान ही जानता है कि जब मैं किसी को साइकिल की सवारी करते या हारमोनियम बजाते देखता हूँ तब मुझे अपने ऊपर कैसी दया आती है. सोचता हूँ, भगवान ने ये दोनों विद्याएँ भी  खूब बनाई है. एक से समय बचता है, दूसरी से समय कटता है. मगर तमाशा देखिए, हमारे प्रारब्ध में कलियुग की ये दोनों विद्याएँ नहीं लिखी गयीं. न साइकिल चला सकते हैं, न बाजा ही बजा सकते हैं. पता नहीं, कब से यह धारणा हमारे मन में बैठ गयी है कि हम सब कुछ कर सकते हैं, मगर ये दोनों काम नहीं कर सकते हैं.   ‌                                    शायद 1932 की बात है कि बैठे बैठे ख्याल आया कि चलो साइकिल चलाना सीख लें. और इसकी शुरुआत  यों हुई कि हमारे लड़के ने चुपचुपाते में यह विद्या सीख ली और हमारे सामने से सवार होकर निकलने लगा. अब आपसे क्या कहें कि लज्जा और घृणा के कैसे कैसे ख्याल

सच का सौदा – सुदर्शन

विद्यार्थी-परीक्षा में फेल होकर रोते हैं, सर्वदयाल पास होकर रोये। जब तक पढ़ते थे, तब तक कोई चिंता नहीं थी; खाते थे; दूध पीते थे। अच्‍छे-अच्‍छे कपड़े पहनते, तड़क-भड़क से रहते थे। उनके माता-पिता इस योग्‍य न थे कि कालेज के खर्च सह सकें, परंतु उनके मामा एक ऊँचे पद पर नियुक्‍त थे। उन्‍होंने चार वर्ष का खर्च देना स्वीकार किया, परंतु यह भी साथ ही कह दिया- ''देखो, रूपया लहू बहाकर मिलता है। मैं वृद्ध हूँ, जान मारकर चार पैसे कमाता हूँ। लाहौर जा रहे हो, वहाँ पग-पग पर व्‍याधियाँ हैं, कोई चिमट न जाए। व्‍यसनों से बचकर ड़िग्री लेने का यत्‍न करो। यदि मुझे कोई ऐसा-वैसा समाचार मिला, तो खर्च भेजना बंद कर दूँगा। ''सर्वदयाल ने वृद्ध मामा की बात का पूरा-पूरा ध्‍यान रक्‍खा, और अपने आचार-विचार से न केवल उनको शिकायत का ही अवसर नहीं दिया, बल्कि उनकी आँख की पुतली बन गए। परिणाम यह हुआ कि

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