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‘रिक्याविक’ पर निर्मल वर्मा : ‘सफ़ेद रातें और हवा’ से कुछ अंश

रिक्याविक

हर शहर के दो चेहरे (या शायद ज्यादा? ) होते हैं, एक वह जो किसी ‘पिक्चर पोस्टकार्ड’ या ‘गाइड बुक’ में देखा जा सकता है –एक स्टैण्डर्ड चेहरा, जो सबके लिए एक सा है; दूसरा उसका अपना निजी, जो दुलहिन के चेहरे-सा घूंघट के पीछे छिपा रहता है. उसका सुख, उसका अवसाद, उसके अलग-अलग मूड, बदली के दिन अलग और जब धूप हो तो बिलकुल अलग; हर बार जब घूंघट उठता है, लगता है, जैसे चेहरा कुछ बदल गया है, जैसे वह बिलकुल वह नहीं, जो पहले देखा था.        क्योंकि दरअसल अजनबी शहरों की यात्रा एक किस्म का बहता पानी है, जिस प्रकार एक यूनानी दार्शनिक के कथनानुसार एक ही दरिया में दो व्यक्ति नहीं नहाते, हालाँकि दरिया वही रहता है, उसी तरह दो अलग-अलग व्यक्ति एक ही शहर में नहीं आते, हालाँकि शहर वही रहता है.        इसीलिए कभी-कभी सोचता हूँ, जितने भी ‘पिक्चर-पोस्टकार्ड’ अलग-अलग शहरों से मैंने अपने दोस्तों

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