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मनुष्यता का दंड – विश्‍वंभरनाथ शर्मा कौशिक 

मास्को से लगभग दो सौ मील पश्चिम की ओर वियाज्मा के निकट - जंगल में घने वृक्षों के मध्य एक बड़ी-सी झोंपड़ी बनी थी। इस झोंपड़ी में एक छोटा-सा रूसी परिवार रहता था। इस परिवार में केवल तीन प्राणी थे। एक प्रौढ़ वयस्क पुरुष, जिसकी वयस पैंतालीस वर्ष के लगभग थी। शरीर का हृष्ट-पुष्ट तथा बलिष्ठ, उसकी पत्नी जो लगभग उसकी समवयस्क ही थी और इनकी एक कन्या जिसकी वयस बीस वर्ष के लगभग होगी। ये दोनों स्त्रियाँ भी खूब तंदुरुस्त थीं। पुरुष का नाम पाल लारेंज्की, स्त्री का नाम स्टेला तथा कन्या का नाम पोला था।दिसंबर की संध्या थी। अस्तासन्न सूर्य की सुनहरी किरणें आकाश में फैले हुए कुहरे को भेदन करने का विफल प्रयत्न कर रही थीं। झोंपड़ी में केवल तीन कमरे थे। एक बैठने-उठने के काम आता था। एक स्त्रियों के सोने के लिए, दूसरे में पाल का बिस्तर था। झोंपड़ी के पिछवाड़े एक 'शेड' था जो

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