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नीलू -महादेवी वर्मा

नीलू की कथा उसकी माँ की कथा से इस प्रकार जुड़ी है कि एक के बिना दूसरी अपूर्ण रह जाती है.          उसकी अल्सेशियन माँ, लूसी के नाम से पुकारी जाती थी. हिरणी के समान वेगवती, साँचे में ढली हुई देह, जिस पर काला आभास देने वाले भूरे-पीले रोम, बुद्धिमानी का पता देने वाली काली पर छोटी आँखें, सजग खड़े कान और सघन, रोएँदार तथा पिछले पैरों के टखने को छूने वाली पूँछ, सब कुछ उसे राजसी विशेषता देते थे. थी भी तो वह सामान्य कुत्तों से भिन्न.          उत्तरायण में जो पगडंडी दो पहाड़ियों के बीच से मोटर-मार्ग तक जाती थी, उसके अंत में मोटर-स्टॉप पर एक ही दुकान थी, जिससे आवश्यक खाद्य-सामग्री प्राप्त हो सकती थी. शीतकाल में यह रास्ता बर्फ़ से ढक जाता था. तब दुकान तक पहुँचने में असमर्थ उत्तरायण के निवासी, लूसी के गले में रूपये और सामग्री की सूची के साथ एक बड़ा थैला या चादर

पद्मावत की कथा

पद्मावती की कहानी

कवि सिंहलद्वीप, उसके राजा गन्धर्वसेन, राजसभा, नगर, बगीचे इत्यादि का वर्णन करके पद्मावती के जन्म का उल्लेख करता है। राजभवन में हीरामन नाम का एक अद्भुत सुआ था जिसे पद्मावती बहुत चाहती थी और सदा उसी के पास रहकर अनेक प्रकार की बातें कहा करती थी। पद्मावती क्रमश: सयानी हुई और उसके रूप की ज्योति भूमण्डल में सबसे ऊपर हुई। जब उसका कहीं विवाह न हुआ तब वह रात दिन हीरामन से इसी बात की चर्चा किया करती थी। सूए ने एक दिन कहा कि यदि कहो तो देश देशान्तर में फिरकर मैं तुम्हारे योग्य वर ढूँढूँ। राजा को जब इस बातचीत का पता लगा तब उसने क्रुद्ध होकर सूए को मार डालने की आज्ञा दी। पद्मावती ने विनती कर किसी प्रकार सूए के प्राण बचाए। सूए ने पद्मावती से विदा माँगी, पर पद्मावती ने प्रेम के मारे सूए को रोक लिया। सूआ उस समय तो रुक गया, पर उसके

मैथिली कोकिल विद्यापति

विद्यापति

रस सिद्ध और मैथिली कोकिल के नाम से विख्यात विद्यापति आदिकालीन कवियों में अन्यतम हैं. संस्कृत, अवहट्ट और मैथिली - तीनों भाषाओं पर समान अधिकार रखने वाले विद्यापति अपनी रचनाओं में रसिक, चिंतक और भक्त की भूमिकाओं का समुचित निर्वाह करते नजर आते हैं. संस्कृत में पुरुष परीक्षा, भू परिक्रमा, शैव सर्वस्व सार, गंगा वाक्यावली आदि ; अवहट्ट में कीर्तिलता और कीर्तिपताका तथा मैथिली में पदावली उनकी रचना यात्रा के कीर्ति स्तंभ हैं. पदावली तो आज भी मिथिला क्षेत्र में विदापत के रूप में लोक जिह्वा पर विराजमान है. भाषा ही नहीं, वर्ण्य विषयों की दृष्टि से भी विद्यापति संधियों के कवि हैं. भक्ति और श्रृंगार - दोनों रसों का मणिकांचन संयोग इनकी कविताओं में मिलता है. डॉ शिवप्रसाद सिंह के अनुसार,  “विद्यापति वस्तुतः संक्रमण काल के प्रतिनिधि कवि हैं, वे दरबारी होते हुए भी जन-कवि हैं, शृंगारिक होते हुए भी भक्त हैं, शैव या शाक्त या वैष्णव होते हुए भी

कबीर की माया

अद्वैत वेदान्त में सामान्यतः माया को ब्रह्म और जीव के बीच पड़े आवरण के रूप में जाना जाता है. यह माया ही है, जो जीव के ब्रह्म से अलग होने का भ्रम उत्पन्न करती है. जीव को ब्रह्म से विच्छिन्न करती है. कबीर दास जी भी माया को इसी भ्रम के रूप में देखते है. यह माया सतगुण, रजगुण और तम गुण की फांस लिये हुये डोलती रहती है और मीठी बानी के द्वारा लोगों को फंसाती है, उन्हें भ्रमित करती है-                 माया महाठगिनी हम जानी                तिरगुन फांस लिये कर डोले                 बोले मधुरी बानी. कबीर के अनुसार त्रिगुणात्मक वृत्ति का ही दूसरा नाम माया है. त्रिगुणात्मक वृत्ति के द्वारा निर्गुण ब्रह्म को नहीं पाया जा सकता- रजगुण, तमगुण, सतगुण कहिबे यह सब तेरी मायाइस माया के परदे को वेध कर ही ब्रह्म का साक्षात्कार हो सकता है. यह माया काम, क्रोध, लोभ, मोह जैसी वृत्तियों का कारण है,

कबीर का रहस्यवाद

आचार्य रामचन्द्र शुक्ल ने कबीर की भक्ति को रहस्यवाद से जोड़ा है और इसे एक प्रतिक्रियावादी दर्शन मानकर कबीर की आलोचना की है. शुक्लजी के मत की समीक्षा करने से पहले आवश्यक है कि रहस्यवाद को समझा जाय. आमतौर पर उस कथन या अनुभव को रहस्यवाद की संज्ञा दी जाती है, जिसमें अज्ञात ब्रह्म की अनुभूति शामिल है. महादेवी वर्मा ने ज्ञात अपूर्ण से अज्ञात  पूर्ण के तादात्मय को रहस्यवाद की संज्ञा दी है. इस अर्थ में रहस्यवाद वस्तुतः आत्म चेतना से विश्व चेतना का एकीकरण है. मध्यकालीन यूरोप में सेन्ट थेरेसा जैसे रहस्यवादी सन्तों ने सामंती जकड़न और चर्च की अनीतियों के खिलाफ संघर्ष का बिगुल बजाया था. कबीर के जीवन और उनके सम्पूर्ण साहित्य को देखें, तो उनकी स्थिति मध्यकालीन यूरोपीय रहस्यवादी संतों जैसी ही है. निश्चय ही यह प्रतिक्रियावाद नहीं है. रहस्यवादी अनुभूति के कारण कबीर को प्रतिक्रियावादी कहना शुक्ल जी का अन्याय ही प्रतीत होता है.

असाध्य वीणा – जीवन के परम सत्य का उद्घाटन

असाध्य वीणा अज्ञेय की एक लम्बी कविता है, लेकिन जैसी चर्चा मुक्तिबोध (अंधेरे में, चांद का मुंह टेढ़ा है) और धूमिल (पटकथा) की लम्बी कविताओं को मिली, वैसी असाध्य वीणा को नहीं मिली. यद्यपि इसका प्रकाशन इनसे पूर्व (आंगन के पार द्वार-1961) हुआ था. इसका कारण कई आलोचक असाध्य वीणा के रहस्यवाद को मानते है. असाध्य वीणा की मूलकथा बौध धर्म के एक सम्प्रदाय जेन या ध्यान संप्रदाय से ली गयी है. ताओवादियों के यहाँ भी इसकी कहानी मिलती है. यह ओकाकुरा काकुजो के The Book of Tea  में The Taming of the Harp के नाम से संकलित है. आरम्भिक बौद्ध धर्म भौतिकवादी है, परन्तु महायान जेन सम्प्रदाय तक आते-आते यह  काफी हद तक औपनिषदिक भाववाद के निकट पहुंच जाता है. महायान के विज्ञानवाद एवं शून्यवाद सम्प्रदाय भी क्रमशः विज्ञान और शून्य की परमता स्वीकारते हैं, जिनकी संकल्पना काफी हद तक  उपनिषदों के ब्रह्म जैसी है. वस्तुतः महायान बौद्ध धर्म

भ्रमरगीत का विरह श्रृंगार

                आचार्य शुक्ल ने श्रृंगार को रसराज कहा है. कारण यह है कि श्रृंगार रस के सहारे मनुष्य के सभी भावों को व्यंजित किया जा सकता है. यद्यपि सूरदास के यहाँ श्रृंगार के दोनों रूपों- संयोग और वियोग का चित्रण मिलता है, तथापि सूरदास का मन वियोग वर्णन में ही ज्यादा रमा है. सूरदास का भ्रमरगीत गोपियों के विरह की मार्मिक व्यंजना का काव्य है. आचार्य शुक्ल के अनुसार “वियोग की जितनी दशायें ही सकती है, जितने ढंगों से उन दशाओं का साहित्य में वर्णन हुआ है और सामान्यतः हो सकता है, वे सब सूरदास के यहाँ मौजूद हैं. सूरदास का कवि हृदय मन की भीतरी तहों तक जाकर वियोग की गहराई नापकर आता है.”                भ्रमरगीत में घटनाओं की विविधता नहीं है. कथा बस इतनी सी है कि कृष्ण के विरह में आकुल गोपियों और राधा को उद्धव निर्गुण ब्रह्म और योग  का संदेश देने आते हैं और गोपियाँ भ्रमर

जगदीशचन्द्र का उपन्यास आधा पुल

हिंदी में युद्ध कथाएँ काफी कम लिखी गई हैं, बावजूद इसके कि हिंदी कहानी की शुरुआत में ही गुलेरी जी ने 'उसने कहा था' जैसी सशक्त कहानी के माध्यम से युद्ध कथा का सूत्रपात् किया था. ऐसे में, जगदीशचन्द्र की 'आधा पुल' हिंदी में युद्ध की पृष्ठभूमि पर लिखी गई एक महत्वपूर्ण रचना के रूप में सामने आती है. युद्ध और प्रेम के ताने - बाने से बुनी इस कथा के केन्द्र में है कैप्टन इलावत, जिसके चरित्र में शौर्य, प्रेम और खिलंदड़ेपन का मणि-कांचन संयोग है. अपने मित्रों, सैनिकों और अधिकारियों के परिवारों तक में लोकप्रिय कैप्टन इलावत के दो ही शौक हैं.. बढ़िया खाना और शर्त लगाना... उसकी शर्त भी एकदम फिक्स.. दो किलो बर्फ़ी... ऐसे खुशमिजाज और यारबाश इलावत का दिल आ जाता है ब्रिगेडियर की साली सेमी पर..... सेमी जिसकी शादी पहले ही किसी और से तय हो चुकी है. 1971 के युद्ध की घोषणा हो चुकी है. इलावत

कुकुरमुत्ता – छद्म प्रगतिशीलता पर प्रहार

कुकुरमुत्ता निराला की श्रेष्ठ और सर्वाधिक विवादित रचनाओं में से एक है। प्रकाशन के तुरन्त बाद बाद से ही कुकुरमुत्ता को लेकर आलोचकों में मतभेद सामने आने लगे। कुकुरमुत्ता एक व्यग्यं रचना है। इस बात पर तो मतैक्य था परन्तु विवाद इस बात पर था कि यह व्यंग्य किस पर है। शुरूआती दौर में आमतौर पर यह माना गया कि कविता में गुलाब शोषक बुर्जुआ वर्ग के प्रतिनिधि के रूप में सामने आता है और कुकुरमुत्ता सर्वहारा वर्ग का प्रतीक है। इन प्रतीकों को ग्रहण करके आलोचकों ने यह घोषणा की कि वहाँ व्यंग्य गुलाब .......शोषक वर्ग पर है वस्तुतः अगर व्यंग्य को गुलाब पर माने तो यह व्यंग्य ही नहीं रह जायेगा क्योंकि कविता के प्रथम खण्ड में प्रत्यक्षतः कुकुरमुत्ते के द्वारा गुलाबको हेय और स्वयं को श्रेष्ठ ठहराया गया है। इस अर्थ में यह कविता व्यंग्य की बजाय अभिधात की कविता बन जायेगी। व्यंग्य को नहीं समझ पाने

गोदान में प्रेमचन्द की नारी दृष्टि

गोदान में प्रेमचन्द के नारी सम्बन्धी विचार अक्सर चर्चा और विवाद के विषय बनते रहे हैं। गोदान में प्रेमचन्द के विचारों के मुख्य स्रोत मेहता के वक्तव्य रहे हैं। अधिकांश आलोचक मेहता को ही उपन्यास में लेखक का प्रोटागोनिस्ट (विचारवाहक) मानते हैं। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार, अगर होरी और मेहता को मिला दिया जाय तो हमारे सामने प्रेमचन्द की आकृति उभर आती है। लेकिन, अपूर्वानन्द जैसे कुछ आलोचक इस धारणा से सहमत प्रतीत नहीं होते। अपूर्वानन्दजी ने कसौटी पत्रिका में एक लेख लिखकर यह स्थापित करने का प्रयास किया कि मेहता के विचारों को प्रेमचन्द के विचार मानना उचित नहीं है। उनके अनुसार लेखक उपन्यास में कई विचारों को सामने लाकर एक सार्थक निष्कर्ष तक पहुंचने का प्रयत्न करता है। इनमें से किसी एक विचार को लेखक का विचार मान लेना तब तक उचित नहीं है, जब तक लेखक स्वयं ऐसे संकेत न दे। अपूर्वानन्दजी को गोदान में मेहता

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